Thursday, May 8, 2014

कुल्फी & Cappuccino: एक सुखद बदलाव की लौ.....

आशीष चौधरी अपनी लेखकीय में ही कहते है कि कहानी कहने का अपना एक सलीका होता है और क्योंकि कहानी उनकी है इसलिये सलीके भी उनके होंगे ।

तो साहब ! एक बात कह दूँ, कि आपके कहानी कहने का सलीका पुरअसर है। यह आपके कहानी सुनाने का तरीका ही है जो किसी भी तीसरे लड़के की कहानी को इतना रोमांचक इतना लयबद्ध और इतना नया बनाये रखता है ।
समय के अनुरुप ही पाठक भी बदलें हैं और लोकप्रिय कहानियों की तरफ झुकाव भी सहज ही देखने को मिल रहा है । अपनी जबान, जो हम-आप रोज बोलते सुनते है वो हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी का सुविधानुसार मिश्रण ही तो है । इसलिये यदि आपकी भाषा मे कोई किताब आपको पढ़ने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह अपनी पैठ लोगो के बीच आसानी से बना ले।

 कुल्फी & Cappuccino, आशीष चौधरी के ऐसे ही प्रयोग का नाम है। प्रयोग इसलिये भी कि इनका लेखन, शैली और भाषा तीनों प्रयोगात्मक है। बहुत बारीकी से आशीष, वहां, उसी भाषा का उपयोग करते है जो, यदि वह वहां होते तो खुद करते । उपन्यास संवादात्मक शैली में लिखा गया है इसलिये यह जरूरी था कि एक संवाद पढ़ने के बाद पाठक को दूसरा जवाब वही मिले जो उसने सोचा है और इस परीक्षा में लेखक खरा उतरता है। यही उसके लेखन की सफलता भी है ।  
लेखक ने यह पहले ही बता दिया है कहानी 2005 के आसपास की है। जब कोई कहानी एक समय विशेष की होती है परंतु उसे लिखा कुछ वक्त बाद जाता है तो इस बात का भी विशेष ख्याल रखना पड़ता है कि वक्ती चूक न हो। कुल्फी & Cappuccino लिखते समय आशीष चौधरी ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है और इसके लिये वह अलहदा बधाई के पात्र हैं।
 
कहानी की बात करें तो यह रंगमंच पर युवा अनुराग की और नेपथ्य में प्रतीक और भूपी की कहानी है। कहानी इन तीनों के MBA की तैयारियों के गिर्द बुनी गई है और इस दौरान हुए कठिनाईयों, फाकामस्ती, प्रेम और तकरार को लेकर आगे बढती है। कोचिंग के दौरान छ: महीनों में हुए मानसिक बदलाव, चिंताये और उनकों काफूर करती दोस्तों की बैठकें, प्रेमियों की बातें, आपको, आपके कॉलेज के दिनों मे यकीनन ले जायेंगी। कहानी अपने अंजाम तक जाते जाते कई रोचक हालात लेकर चलती है। हालांकि जो रहस्य, लेखक लेकर चलता है वह थोड़ा और देर से खुलता तो उछल पड़ने वाली बात होती। कहानी का अंत थोड़ा पहले हो जाता है । फिर यह बात भी ज़ेर ए गौर है कि आशीष किताब खत्म करने से पहले कहते है कि यह कहानी का अंत नहीं है ।

कुल्फी & Cappuccino कम ओ बेश एक अलहदा और उम्दा प्रयास है । यह युवाओं की कहानी कहती है। यह पिता-पुत्र के सम्बन्धों को एक पुत्र के नजरिये से देखने का प्रयास करती है । यह प्रेम की पराकाष्ठा भी इंगित कर जाती है - चाहे एक वाक्य मे ही सही। यह युवाओं के मन में घुमड़ते अनेक सवालों के जवाब तलाशने का प्रयास भी है। संक्षेप यह कि अनुराग, प्रतीक और अंकुर कम ओ बेश ही सही, हर पाठक में हैं, मुझमें भी।

कुल्फी & Cappuccino आज के Y generation को खूब पसन्द आयेगी। यह उनकी कहानी कहती है ,उनको ध्यान मे रख कर लिखी गई है इसलिये यह सही मायने में उनकी किताब है। हाँ ! अगर बौद्धिकता का लबादा उतार दिया जाये तो यह नव क्लासिकी के कद्रदानों को भी पसन्द आयेगी, ऐसा मेरा ख्याल है ।

आशीष चौधरी से- अगली कहानी लिखना शुरु कर दें साहब। After all, it’s not ankur kind of request.

Y generation से- अच्छा पढने की आदत एक अच्छी आदत है ।

Wednesday, April 2, 2014

मसाला चाय: लाजवाब स्वाद



मसाला चाय: लाजवाब स्वाद
किताब: मसाला चाय
विधा: कहानी संग्रह
प्रकाशक: हिन्द युग्म
प्राप्ति स्थान: सभी ऑनलाईन स्टोर्स पर उप्लब्ध|



इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक अपनी किशोरावस्था में है और पहले दशक की कहानियां लिख रहा है। इस पहले दशक की कहानियां पूर्ववत कहानियों से इतर तो नहीं ही हो सकती। हां, परिवेश,समाज, नाम और विकास कुछ आगे बढ जाता है और यही कहानियां गढने का माध्यम और कारण बन जाती हैं। कहना न होगा कि भगवतीचरण वर्मा जिन बातों को टाईपराईटर के माध्यम से कह जाते थे आज वही कम्प्यूटर के माध्यम से कही जाती हैं।

 ‘मसाला चाय’ पर बात करने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि हिन्दी साहित्य मे लोकप्रिय साहित्य का पक्षधर रहा हूं और मेरे निजी विचार हैं कि वर्तमान परिस्थिति में हिन्दी साहित्य को पुनर्स्थापन एवं प्रतिस्पर्धी होने के लिये लोकप्रिय साहित्य की अविलम्ब दरकार है।

’मसाला चाय’, ‘दिव्य प्रकाश दुबे’ का दूसरा कथा संग्रह है। जिसमें कुल 11 कहानियां है। बालपन से लेकर किशोरावस्था तक के विभिन्न मनःस्थिति को दर्शाती यह कहानियां दरअस्ल सच्चाईयां हैं जिन्हें दिव्य प्रकाश दुबे ने उम्र के चढाव के अनुसार सजाया है।

पहली कहानी ‘ विद्या कसम’ बालपन की के मनोभाव को खूबसूरती से उकेरती है। बच्चों के चारित्रिक आचरण को समझने की कोशिश करती यह कहानी झूठ, डर, प्रेम, आदि कितनी ही भावनाओं को एक बच्चे की नजर से समझने का प्रयास है। इस कहानी को पढकर अनायास ही बशीर बद्र याद हो आते हैं:
‘उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख हवा में
फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते’।

दूसरी कहानीं ‘जीवनसाथी.कॉम’ प्रेम विच्छेद से उबर रहे एक युवक की कहानी है जिस पर घर से शादी करने का दबाव है और इसी कारण वह मैट्रिमोनियल साईट्स की शरण मे जाता है । इस कहानी के बारे मे बस इतना ही कहूंगा कि यह आपको  ओ. हेनरी की कहानियों की याद दिला देगी। कहानी हो समाप्त करते हुए आप लेखक को ‘वाह कहे बिना रह नहीं पायेंगे ।

‘बेड़ टी’ हठात ही बेरोजगार हो गये एक कॉरपोरेट यूथ की कहानी है जिसे अपने आने वाले कल की चिंता भी करनी है और अपनी लिव इन पार्टनर और उसके पिता दोनों को संतुष्ट करना है। इस साहसिक विषय पर (कम अज कम मेरे लिये तो साहसिक ही है) सफलतापूर्वक लिखने का दुस्साहस करने के लिये दिव्य प्रकाश बधाई के पात्र हैं।

वैसे तो सभी की सभी कहानियां अपना अलग कलेवर लिये हुए हैं परंतु यदि मेरी पसन्द ही सर्वमान्य हो तो इस संग़ह की सबसे अच्छी कहानी ‘KEEP QUITE’ है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था की तरफ जा रहे बच्चों मे हो रहे मानसिक बदलाव तथा उसपर उचित मार्गदर्शन के अभाव मे होने वाले दुष्परिणाम को जितनी सरलता और जीवंतता से लेखक ने प्रस्तुत किया है वह बिरले ही देखने को मिलता है।
इस कहानी के अस्वाभाविक अंत ने मुझे परेशान कर दिया:
’मै तो समझा था भर चुके सब ज़ख्म
दाग़ शायद कोई कोई है अभी’
खैर, इस कहानी लिये ‘दिव्य प्रकाश’ को एक अलहदा बधाई बनती है।

पूरे कथा संग्रह से गुजरते हुए एक बात पर नज़र जाती है कि कहानी के होने और लिखे जाने में जो समयांतर है वह कहीं कही परिलक्षित होता है। मगर वह कथा की मूल विषय वस्तु को प्रभावित नहीं करता।

अंत में, इस कथा संग्रह की सबसे सकारात्मक बात पर अगर गौर न करूं तो यह बतकही अधूरी रह जाएगी।‘इसकी छपाई’। जी हां... कम अज कम मैनें तो पहली बार यह सुखद पहलू देखा की हिन्दी कथा संग्रह में भी अंग्रेजी मे कहे गये वाक्य अंग्रेजी मे ही छपे हैं वरना तो हिन्दी उपन्यास मे देवनागरी लिपी मे अंग्रेजी पढना दुष्कर होता है। इस नये चलन के लिये समग्र टीम को बधाई।
मसाला चाय पी कर देखिये। कायल हो जायेंगे।

सलाम,
सत्य व्यास


Wednesday, March 19, 2014

भले दिनों की बात थी......


पुस्तक समीक्षा
भले दिनों की बात थी...
नाम: भले दिनों की बात थी...
विधा: उपन्यास
उपन्यासकार: विमल चन्द्र पांडॆ
प्रकाशक: आधार प्रकाशन

हर्फ ए ताजा की तरह किस्सा ए पारीना कहूं
कल की तारीख को मैं आज का आइना कहूं।

‘ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार’ से सम्मानित विमलचन्द्र पांडे’ की यूं तो ये चौथी किताब है परंतु ‘भले दिनों की बात थी’, विमल चन्द्र पांडॆ का पहला उपन्यास है । उपन्यास का विन्यास, कथा कहानियों से इतर होता है और इसको उपन्यासकार ने बखूबी पहचाना है और उसी अनुरूप विन्यास दिया है।

कथा की बात करें तो संक्षेप में यह चार दोस्तों की कहानी है जिसका मुख्य पात्र ‘रिंकू’ यूं तो मुसलमान है परंतु पढाई के लिये वह बनारस की एक रेलवे कॉलोनी मे रहता है और उसे उसके पुकार के नाम ‘रिंकु’ के कारण लोग उसे हिन्दू ही समझते है। इसी मुहल्ले मे उसे एक लडकी ‘सविता’ से किशोरवय प्रेम होता है। यह उपन्यास इसी प्रेम की परिणति के अधूरे प्रयासों, कयासों और साहसों की कहानी है। यह उपन्यास रिंकु के किशोर से युवक और अधीर से गम्भीर बनने की कहानी है। यह उपन्यास दोस्ती की कहानी बयां करती है । यह उपन्यास प्रेम के आयाम दर्शाती है। यह उपन्यास सामाजिक ताने बाने को समझने का प्रयास करती है ।

उपन्यास ‘भले दिनों की बात थी’ की मूल कथा 2003 से 2006 तक की कहानी कहती है और उपसंहार 2016 की । कस्बाई या यूं कहें मोहल्ले का जितना सजीव चित्रण ‘विमलचन्द्र पांडे’ ने किया है, हालिया दिनों मे बिरले ही देखने को मिला है। भविष्य के लिये चिंतित युवा हों या बेटी के लिये चितित मां । धर्म का सवाल हो या फिर मुहल्ले का बवाल। दोस्तों की बैठकबाजियां हों या प्रेमियों की कारसाजियां, लेखक ने अनिरिक्त प्रयास से ही इसे शब्दों मे ढाल दिया है। चित्रण भी ऐसा कि चरित्र ही नहीं बल्कि माहौल भी आंखों के सामने घूमने लगता है। एक बानगी देखें:

“सविता जैसे ही कॉलोनी के मोड़ पर मुड़ी, उसे सामने से आता रिंकू दिखाई दिया जिसके होठों पर मुस्कान और मन मे उथल पुथल थी / वह अपने आप को संयत कर पीछे पीछे चल पड़ी”।

‘भले दिनों की बात थी’ को किसी एक कथाविध मे नही रखा जा सकता। कहीं कहीं यह आपको प्रेम कहानी लगती है तो कहीं यह सामाजिक उधेड़बुन की व्यथा सुनाती है। कहीं यदि यह आपको मित्र- गाथा लगती है तो अचानक ही किसी रोमांचक उपन्यास की तरह मुड़ जाती है।

‘विमलचन्द्र पांडे’ ने कस्बाई और भाषाई दोनों लिहाजों से बनारस को न सिर्फ जिया है बल्कि उसे आत्मसात भी किया है। जागरण का वर्णन, मित्रों का अंग्रेजी शिक्षण या फिर प्रेमियों के पलायन की योजनाओं का विवरण, आपको कस्बाई भाषा की छौंक जरूर मिलेगी और यही इस उपन्यास की यू,एस.पी भी है। 

‘पहले जानों. तब छरियाओ’।

‘मारब सारे चिंगुर जइबे।

‘तुम डॉक्टर से कैसे बात करते हो बे ? तुम्हारा अंगरेजिया अब्बो वैसा ही है’।

भाषा के भदेसपन मे लपेटते हुए उपन्यास के चरित्र को कब आप अंगीकार कर लेते है,पता ही नही चलता। आप पात्रों के साथ खुद को जोड़ ही नही लेते अपितु खुद उसकी जगह ले लेते है। यही उपन्यासकार के रूप मे विमल की सफलता है।

यह उपन्यास मशहूर शायर डॉ अहमद फ़राज़ मरहूम को समर्पित किया गया है । मगर यह समर्पण सायास ही है । अक्सर उन्हीं के शेरों के साथ प्रारम्भ होने वाले अध्यायों का निहितार्थ आगे मिलता जाता है और आप को शेर के कहे जाने का अर्थ समझ आता है।

अंत मे.... इस उपन्यास की सफलता की कामना करता हूं और विमल चन्द्र पांडे को बधाई देते हुए डॉ अहमद फ़राज़ मरहूम को ही दोहराना चाहूंगा:

जिसके हिज़्रां मे किताबों पे किताबें लिख दी
उसपे गर हाल हमारा नहीं खुलता, न खुले।

सलाम : सत्य व्यास

Friday, February 28, 2014

1984




 भाग 4 
31 अक्तूवर 1984
माहौल शाम से बिगडना शुरु हुआ। रेडियो और कुछ धनाढ्यों के घर टीवी पर तो यह समाचार दोपहर से ही प्रसारित  होने लगा कि प्रधानमंत्री जी की हत्या उन्ही के दो ‘सीख’ बॉडीगार्डों ने कर दी। बार बार लगातार इस ‘सीख’ शब्द पर जोर दिया गया। यह भूलकर कि ‘सीख’ कोई शब्द नहीं बल्कि ओज़, वीरता और स्वाभिमान का प्रयाय है। ‘एम्स’ के पास शाम होते होते हुज़ूम जमा हो आई । आततायियों के लिये तो महज़ एक बोतल शराब ही आग है फिर उसपे ‘खून का बदला खून’ और ‘मां का बदला बेटे लेंगे’ जैसे नारों ने घी का काम किया। शाम सात बजे से दंगाईयों ने एम्स और उसके आस पास के इलाके फूक दिये ।
मिस्टर नागपाल अपने अस्थमा के नियमित चेकअप के लिये तड्के ही एम्स के लिये निकल गये थे। मगर जब पहुंचे तो वहां की हालत देख कर लौट गये । जब लौटे तो दिल्ली के दिल में बवाल मचा था और उनके दिल में सवाल। सवाल यह कि क्या यह दंगा मेरे ‘पालम’ तक भी पहुंचेगा। क्या हम अपने भर मे भी महफूज नहीं हैं? पालम तो मेरा गांव है, मेरे अपने लोग हैं, मेरे भाई हैं। तकसीमी सियासत से महरूम। क्या ये भी वैसा ही करेंगे जैसा वह रास्ते भर सुनते आयें हैं। रास्ते मे हरनाम मिला था पुछ रहा था कि उसक बेटा भी एम्स ही गया है । कहीं दिखा क्या? उसकी आंखो मे एक सूनापन छोड कर मिस्टर नागपाल आगे बढ गये ।
बुझे मन से जब मिस्टर नागपाल अपने घर मे घुसने लगे तो उन्होने ऋषि के कमरे के बाहर चार जोडी चप्प्लें देखीं। यह असामान्य बात इसलिये भी थी कि किराये पर कमरा देते वक्त मिस्टर नागपाल ने पहली शर्त यही रखी थी कि कमरे मे छडेबाजी उन्हे बिल्कुल नहीं पसन्द और दूसरी इसलिये भी की बीते सात महीनों से ऋषि ने किसी को घर पर नही बुलाया था और उनकी शर्त का पूरा ख्याल रखा था। मिस्टर नागपाल को एक बार ख्याल आया कि बाहर तक आने वाली फुस्फुसाहट अचानक बन्द क्यों हो गई । पर कुछ सोचकर वह धीरे धीरे सीढीयों से चढ कर उपर अपने घर मे दाखिल हो गये ।
नीचे ऋषि के कमरे मे बन्द फुस्फुसाहट फिर तेज हो गई।
‘इसको भी मारेंगे’ । ‘तसल्ली से मारेंगे साले को’। ‘पिछले साल जगराता का चन्दा मांगने आये थे तो डांट कर भगा दिया था साले ने’ । पहले ने कहा।
’भाई, लड्कों मे काफी बेईज़्ज़ती हुई थी अपनी’। दूसरे ने कहा।
‘घणा चौधरी बना फिरता है मुहल्ले का’। ‘कल निकालेंगे चौहद्दी इसकी’ । पहले ने फिर कहा ।
’लेकिन करना क्या है’ ? अबकि बार तीसरे ने पूछा।
‘करना कुछ नही है ज्यादा से ज्यादा लडके जमा करो’ । ‘असलहे और रॉड वगैरह जमनापार से आ रहे है’। ‘वोटर लिस्ट मिल गई है’। ‘इनके सारे घरों पर एक निशान लगा देना है जिससे हमारे भाई समझ जायें कि इसी घर पे हमला करना है’ ।‘अस्लहे की कमी नही होगी बस लडके होने चाहिये’ । ‘ओये ऋषि इसीलिये तेरे पास भी आयें हैं’। ‘इन सालों को  खींच खींच के, निकाल निकाल के मारना है’ । ‘तू चल रहा है ना साथ’! पहले ने एक सांस मे कहा ।
’हां हां भाई’।‘बिल्कुल साथ हूं’। ‘जब आप कहें’। ऋषि ने एक सांस मे कहा ।
’शाबाश’ । ‘भाई है अपना तू’ । ‘और वैसे भी चलना तेरी मजबूरी है’। ‘पंजाबियों के घर किरायेदार है’। ‘कही अन्जाने मे तुझे भी मत टांग दें सरिये पर’। तीसरे ने खिखियाते हुए कहा।
’अच्छा अब चलते है । बाकि लडकों को भी इक्ट्ठा करना है। ‘तुझे लेने मै ही आउंगा, तैयार रहियो’। कहकर तीनों लडके कमरे से बाहर निकल गये ।
निकलते वक्त ऋषि ने देखा कि ‘पहले’ ने धीरे से इंट का एक टुकडा उठा कर मकान पर कोई निशान बना दिया। उसकी रूह कांप गई। उसने फौरन अपने कमरे का दरवाजा बन्द किया और बैठ कर सोचने लगा । इस स्थिति मे भी उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था। इसिलिये उसने तपाक से उनका साथ देने की हामी भर दी थी । उसने सोचा था कि वह उपर जा कर मिस्टर नागपाल को सारी बात बता देगा और उनसे इसी वक्त घर छोड कर जाने के लिये कहेगा । जैसे ही मिस्टर नागपाल निकल जायेंगें वह जाकर उन लडकों को बतायेगा कि उसके मालिक मकान तो निकल रहे हैं। जो करना है अभी करो । लेकिन उनकी तैयारी तो रात की है दिन होने की वजह से वो कुछ कर नही पायेंगे और् इस तरह उसपर कोई शक भी नही करेगा ।
यही सब सोचते हुए ऋषि तेज कदमों से सीढियां चढने लगा कि तभी उसे मिस्टर नागपाल नीचे उतरते  दिखाई दिये ।
इस वक्त कहां जा रहे है अंकल ? ऋषि ने अचरज से पूछा ।
गेट मे ताला लगाने । मिस्टर नागपाल ने कहा।
लाईये मैं लगा देता हूं। ऋषि ने ताला लेते हुए कहा ।
’माहौल ठीक नहीं है’।‘तुम भी घर से मत निकलो’ । मिस्टर नागपाल ने ताला खींच कर देखा ।
अंकल मुझे इसी बारे मे आपसे कुछ बात करनी है। ऋषि ने चाभियां थमाते हुए कहा ।
कहो। मिस्तॅर नागपाल को अनिष्ट की आशंका हो गई थी ।
ऋषि जानता था कि मिस्टर नागपाल अस्थमा के मरीज हैं और इतनी गम्भीर बात उनपे क्या असर कर सकती है। फिर भी उसने ऋषि बातें और योजनायें विस्तार मे बता दीं। यह भी उनके घर के बाहर भी निशान लगा दिया गया है ।
‘और तुम भी उनके साथ हो’ ? सब सुनकर मिस्टर नागपाल ने बस एक सवाल पूछा ।
’मुझे अपना घर बचाना है’ । ऋषि ने धीरे से कहा।
’और तुम्हारे अपने लोग’? मिस्टर नागपाल ने पूछा।
’जो मेरे अपने हैं, उन्ही के साथ हूं’ ।‘आप बस इतना करें कि आंटी, मनु और कीमती माल असबाब लेकर अभी के अभी किसी रिश्तेदार के यहां चले जाएं या किसी गुरुद्वारे में’। ‘मामला शांत होने पर फिर वापिस आ जाईयेगा’। ऋषि ने समझाने की कोशिश की ।
’और जब वापिस आयें तो घर पर दूसरे का कब्जा पायें’। ‘अपने ही घर के लिये पुलिस कोर्ट के दरवाजे खटखटायें’। ‘उन्हे एक हफ्ते के भीतर ही अपने जिन्दा होने क सबूत दिखायें या फिर एक बार फिर रिफ्यूजी के सर्टिफिकेट के लिये गिड्गिडायें और फिर कहीं बद्बूदार नाले या सडान्ध के पास रिहैबिलिटेट किये जाएं। नहीं बेटाजी नहीं। इस दफा ये नही होने का। इस दफा यहीं मरेंगे, अपने लोगों के बीच। और चाहे तो तू ही मार दे’ । मिस्टर नागपाल ने फफकते हुए कहा ।
ऋषि के पास समय ज्यादा नहीं था और मिस्तर नागपाल मानने को तैयार नहीं थे। उसे जल्दी ही कुछ और सोचना था।
उसे सोचना था कि सबसे सुरक्षित जगह के बारे मे । उसे सोचना था आने वाली काली सुबह के बारे मे । उसे सोचना था तीन तीन अपनों के बारे मे । और सबसे उपर उसे सोचना था मनु के सपनों के बारे में । नह तेजी से सोच रहा था। अचानक उसने सिढियों पर बैठे मिस्टर नागपाल को उपर चलने को कहा ।
क्या हुआ ? मिस्टर नागपाल ने सेर उठा कर पूछा ।
बस चलिये । ऋषि ने उन्हें हाथ से लगभग खींचते हुए कहा ।
उपर कमरे में मिसेज नागपाल और मनु दरवाजे से सट कर नीचे की बातें सुनने की कोशिश ही कर रही थीं। माहौल की नज़ाकत और मनु की रेडियो की आदत ने इतना तो बता ही दिया था कि सब कुछ ठीक नही है और रही सही आशंका मिस्टर नागपाल ने दिन मे गेट बन्द कर पूरी कर दी थी।
उपर पहुंचते ही ऋषि ने सबसे पहले दरवाजा बन्द किया और सारी हालात फिर से तीनों को बता दीं । यह भी कि खतरा जान ओ माल का भी है और यह स्थिति कमोबेश पूरी दिल्ली की होने वाली है।  हालांकि उसने यह नही बताया कि इस घर कि निशानदेही हो चुकी है। समय भी अपने बायीं ओर तेजी से खिसकता जा रहा है ।
आपलोग मेरे कमरे मे रहेंगे। ऋषि ने लगभग आदेश दिया ।
ह्म अपना घर छोड कर कहीं नही जायेंगे । ये घर, ये मकान यूं ही छोड कर भाग जाने के लिये नहीं बनाया था । मिस्टर नागपाल जिद पर अडे थे ।
आप अपना घर छोड कर कहीं नही जा रहे । बस यहां खतरा ज्यादा है इस्लिये  आप नीचे वाले कमरे मे जा रहे हैं। देखिये...  वो जानते है कि नीचे वाला कमरा मेरा है और उसमे ताला भी इस वजह से लगा है क्युंकि मै बाहर हूं । उनके पास समय नही होगा छानबीन का। एक बार देखेंगे कि उपर कोई नही है तो हो सकता है कि चले जायें। ऋषि ने मिस्टर नागपाल का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए कहा ।
इस बार जब मिस्टर नागपाल ने कुछ नही कहा तो ऋषि को विश्वाश हुआ कि वह आगे बात कर सकता है ।
’आंटी आप रोईये नही और मेरी कुछ बातें ध्यान से सुन लिजिये। घर मे जितना भी आलू या कन्द है पका लिजिये । ना जाने ये बलवा कितना लम्बा चले। पीने का पानी मेरी सुराही मे है। यहां से ले जाना खतरनाक् होगा। उससे ही काम चलाना होगा। घर से बस सोने चान्दी जैसे कीमती सामान और कुछ कपडे ही लेकर चलिये। कुछ कपडे बिखरा दिजिये और आलमारी खुली छोड दिजिये। ऋषि ने जब कहना बन्द किया तो उसने देखा कि मिसेज नागपाल की जगह मनु रो रही है।
बेटा जी सब ठीक तो होगा ना । मिसेज नागपाल ने आलू तसले मे डालते हुए कहा।
जी भगवान पर भरोसा रखिये। ऋषि ने मिस्टर नागपाल की दवाईयां सहेजते हुए कहा।
हमने किसी का क्या बिगाडा है । मिसेज नागपाल ने नाक पोछते हुए कहा ।
ऋषि  को लगा कि उसके रहने की वजह से मिसेज नागपाल को अपनी कीमती सामान निकालने मे झिझक हो रही है। उसने फौरन ही कहा ।
आप लोग सामान बांध लें मै जरा नीचे से होकर कर आता हूं । उसने मिस्टर नागपाल से गेट की चाभी लेते हुए कहा।
 नीचे आते ही ऋषि ने सबसे पहले बाहर से जाकर अपनी खिडकी की दारारों  से झांक कर खुद को आश्वस्त किया कि बाहर से कुछ दिखता तो नही है । क्योंकि उसे पता था कि भीतर से बाहर दिखता है । कमरा छोटा होने के कारण तीन लोग खिडकी के तरफ ही बैठ पायेंगे। दरवाजे के पास बैठना तो खतरे से खाली नही है। आस्वस्त होने के उसने सुराही मे पाने भर दिया। वह थोडा सुस्ताना चाह रहा था मगर उसे पता था कि अगले कुछ घंटे उसपर बहुत भारी गुजरने वाले है। इसलिये वह उठा और उपर की ओर चल दिया ।
उपर पहुंचते ही उसने दरवाजे पर खडी मनु को देखा। मनु... मनजीत नागपाल । जिसे कभी उसने इतना शांत नही देखा था। इतना उज़ाड । इतना शीतरक्त।  मनू जिसे कभी कुछ पता नही होता। हर बात पर उसका एक  ही जवाब होता ‘ मैनु की पता’ । आज लगता है जैसे सब जान गई है । निर्वाण की स्थिति है जहां सब कुछ नीरव हो जाता है । उसे ऐसे देख ऋषि थोडा डर गया फिर भी खुद को सम्भाल कर कहा ।
’तैयारी हो गई’।
उजडने के लिये क्या तैयारी करनी है बेटा। बस आपने जो कहा था वो रख लिया है । मिसेज नागपाल ने कहा ।
आईये फिर नीचे चलते हैं उसने असहाय से पडे मिस्टर नागपाल को उठाते हुए कहा ।
क्रमश:)(